कश्मीर में आतंकियों को भी सैलरी-प्रमोशन; पहलगाम वाले 14 में से 12 आर्टिकल-370 हटने के बाद बने आतंकी

Pahalgam Attack: मैं 2003 में पाकिस्तान गया था। तब उम्र सिर्फ 14 साल थी। 7वीं में पढ़ता था। नादानी में बॉर्डर पार चला गया। मेरे साथ और भी लोग थे। वहां हमें 2-3 महीने ट्रेनिंग दी गई। 3 महीने बाद फिर कैंप में वापस आए। वहां 5-6 साल रहे। शुरुआत में हर महीने 1 हजार से 1500 रुपए मिलते थे। जैसे-जैसे मैं सीनियर हुआ, मेरी सैलरी 20-22 हजार रुपए हो गई।
पहलगाम में 26 टूरिस्ट के कत्ल के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने 14 लोकल आतंकियों की लिस्ट जारी की है। अब ये सुरक्षाबलों के टारगेट पर हैं। इनमें 19 साल का आदिल रहमान और 25 साल का आसिफ अहमद शेख आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के डिस्ट्रिक्ट कमांडर हैं। 28 साल का जुबैर अहमद वानी हिजबुल मुजाहिदीन का चीफ ऑपरेशनल कमांडर है।
भर्ती, ट्रेनिंग, सैलरी, प्रमोशन पढ़कर शायद लग रहा हो कि ये कॉर्पोरेट कंपनी की बात हो रही है, लेकिन ऐसा नहीं है। ये कश्मीर में आतंकी संगठनों के काम करने का तरीका है। दैनिक भास्कर को ये बात बताने वाले शख्स खुद आतंकी रह चुके हैं। फिर सरेंडर करके आम जिंदगी में लौट आए।
पहलगाम हमले में शामिल आदिल गुस्से में बना आतंकी
कश्मीर में आतंकी संगठनों के टारगेट पर कम उम्र के लड़के होते हैं। कई बार तो वे नाबालिगों को भी अपने साथ जोड़ लेते हैं। आदिल रहमान जब लश्कर से जुड़ा, उसकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। ज्यादातर लड़के गुस्से में या किसी लालच में आतंकी संगठनों से जुड़ते हैं।
ये पहलगाम अटैक में शामिल रहे आदिल अहमद ठोकर की पड़ताल के दौरान इसका पता चला। साइंस से ग्रेजुएट और उर्दू में MA करने वाला आदिल टीचर होने के बाद भी आतंकी बन गया। 2017 में उसकी जमीन पर मोबाइल टावर बनाने को लेकर विवाद हुआ था।
Pahalgam Attack: पुलिस और आर्मी की तरह आतंकियों की भी रैंक और डेजिग्नेशन
सोर्स बताते हैं कि आतंकी संगठन नए कैडर को भर्ती करने के बाद उन्हें ट्रेनिंग देते हैं। एक्टिविटी के हिसाब से रैंक देते हैं। फिर उनके जरिए नए युवाओं को भर्ती करवाते हैं। हमारी पड़ताल में आतंकी संगठनों के बारे में तीन बातें पता चलीं।




