सच आज बेरोज़गार है और चापलूसी पद पर: ऋषि नारायण आचार्य

Acharya: लोकतंत्र में मीडिया का जन्म किसी विज्ञापन अनुबंध से नहीं हुआ था। वह तो एक नैतिक जिम्मेदारी के साथ पैदा हुआ था-सत्ता से प्रश्न करने की जिम्मेदारी। किंतु समय के साथ यह जिम्मेदारी इतनी हल्की होती गई कि आज वह केवल औपचारिक अभिवादन बनकर रह गई है। अब मीडिया सवाल नहीं पूछता, वह पहले यह पूछता है कि सवाल पूछना सुरक्षित तो है?
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आज यह बहस बेमानी हो चली है कि मीडिया प्रिंट का हो या इलेक्ट्रॉनिक का। दोनों ही माध्यमों में बीमारी एक-सी है, केवल लक्षण अलग-अलग हैं। कहीं शब्द स्याही में लिपटे हैं, तो कहीं आवाज शोर में डूबी हुई है। अखबार के कॉलम हों या टीवी के स्टूडियो-आत्मा दोनों जगह लगभग समान रूप से अनुपस्थित है। मीडिया का नया मंत्र अब यह नहीं कि जनता क्या जानना चाहती है, बल्कि यह है कि सत्ता को क्या अच्छा लगेगा। प्राथमिकता प्रश्न करने की नहीं, बल्कि वातावरण बनाने की है-ऐसा वातावरण, जिसमें असुविधाजनक सवाल अपने आप ही अप्रासंगिक हो जाएं। जनविरोधी निर्णयों के खिलाफ आवाज उठाना अब जोखिम भरा माना जाता है, जबकि सत्ता को सुरक्षित और संरक्षित दिखाना पेशेवर कुशलता का प्रमाण बन चुका है।
हमारी शालीनता तो देखिए-पहरा कब का छूट चुका है, फिर भी आईने में आज तक हम स्वयं को प्रहरी ही कहते चले आते हैं। पर यह वह प्रहरी है, जो सीटी नहीं बजाता, बल्कि इशारों को समझता है। जो चोर को पहचानने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि कहीं वह प्रभावशाली तो नहीं। और यदि प्रभावशाली हो, तो प्रहरी स्वयं दरवाजा खोल देता है-पूरी विनम्रता और मुस्कान के साथ।
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Acharya: सच उस शोर में कहीं रह जाता है दबकर
प्रिंट मीडिया में यह मुस्कान शब्दों की कतरन में दिखती है। शीर्षक इतने गोल होते हैं कि उनमें कोई कोना नहीं बचता, जहां सवाल अटक सके। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वही मुस्कान ऊंची आवाज में बदल जाती है-इतनी ऊंची कि दर्शक को लगता है, सच बोल दिया गया है, जबकि सच उस शोर में कहीं दबकर रह जाता है। मीडिया कर्मियों को अब पाठक या दर्शक की पहली पसंद बनने की चिंता नहीं रहती। वह दौर पुराना हो चुका है। आज सर्वोच्च प्राथमिकता सत्ता की पहली पसंद बनने की है। क्योंकि पाठक नाराज होकर अखबार बंद कर सकता है, दर्शक चैनल बदल सकता है-लेकिन सत्ता नाराज हो जाए, तो करियर बदलना पड़ सकता है।
इसलिए मीडिया ने एक सुरक्षित रास्ता चुना है-सत्ता को असहज न करने का रास्ता। इस रास्ते पर चलते हुए संपादकीय भी संतुलित हो जाते हैं, बहसें भी नियंत्रित हो जाती हैं और सवाल भी इतने शालीन हो जाते हैं कि उनका कोई अर्थ ही नहीं बचता। इसे ही आज परिपक्व पत्रकारिता कहा जाता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मीडिया इस स्थिति पर शर्मिंदा नहीं है। बल्कि वह इसे अपने अनुभव की पराकाष्ठा मानता है। युवा पत्रकारों को सिखाया जाता है कि खबर कैसे लिखनी है, पर यह नहीं बताया जाता कि कब लिखनी है और कब रुक जाना है। यह मौन-शिक्षा अब पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।
कभी अखबार सत्ता के लिए सुबह की चिंता हुआ करते थे। आज वे सत्ता के लिए सुबह की चाय जैसे हो गए हैं-साथ में हों तो अच्छा, न हों तो भी दिन निकल ही जाएगा। चैनल कभी सरकारों की नींद उड़ाते थे, अब वे सरकारों के मूड का अंदाजा लगाते हैं।
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Acharya: साहस को अलमारी में टांग दिया
यह संपादकीय किसी माध्यम के विरुद्ध नहीं है। यह उस मानसिकता के विरुद्ध है, जिसने पत्रकारिता को धीरे-धीरे सुविधा का वस्त्र पहना दिया और साहस को अलमारी में टांग दिया। मैं हास्य-व्यंग्य की शैली का प्रयोग इसलिए करता हूं, क्योंकि भाषा का उद्देश्य चेतना जगाना है, पाठक को बोझिल कर देना नहीं।
अब भी समय है। प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक दोनों के पास कलम और कैमरा मौजूद हैं। प्रश्न केवल इतना है कि क्या वे उन्हें प्रश्न पूछने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, या केवल सत्ता की पसंद बने रहने के लिए। क्योंकि जिस दिन मीडिया ने यह मान लिया कि सत्ता की सुरक्षा ही पत्रकारिता का धर्म है, उस दिन लोकतंत्र को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि उसका प्रहरी वर्दी में नहीं, बल्कि विज्ञापन के कपड़ों में खड़ा है-और सीटी बजाने के बजाय ताली बजा रहा है।
मीडिया की सबसे बड़ी हार यह नहीं कि वह सत्ता से डरता है, बल्कि यह है कि वह सत्ता की पसंद बनकर स्वयं को श्रेष्ठ, सुरक्षित और गौरवान्वित महसूस करता है।
NEWS SOURCE Credit: Rishi Narayan Acharya




